ब्लॉग : राष्ट्रगान पर सुप्रीम कोर्ट का सराहनीय फैसला !

द्वारा : - आशीष रावत

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राष्ट्रगान बजाने और उसके सम्मान में खड़े होने की परंपरा कहां से आई? क्या संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था है कि लोगों को राष्ट्रगान के सम्मान में खड़ा होना ही चाहिए? सिनेमाहाल में राष्ट्रगान बजाने का रिवाज कहां से आया? कौन-कौन से राज्य हैं जहां पर इस प्रथा का पालन होता है? कौन-सा राज्य है जहां पर इसकी शुरुआत हुई? राष्ट्रगान के सम्मान और अपमान को लेकर कई बार सवाल उठते रहे हैं. कोई पीड़ित होता है तो कई प्रताड़ित. वैसे कई अन्य देशों में भी सिनेमाहाल और थिएटरों में राष्ट्रगान बजाने की प्रथा है. भारत में आजादी के कुछ समय बाद तक यह प्रथा सिनेमाहॉल में थी. फिल्म समाप्त होने के बाद ऐसा होता था. लेकिन फिल्म समाप्त होने के बाद ऐसी प्रथा होने के कारण लोग घर जाने की जल्दी में रुकना पसंद नहीं करते थे और एक प्रकार से राष्ट्रगान के समय लोग सिनेमाहॉल से बाहर जाने लगते थे. यह राष्ट्रगान के अपमान के समान था और फिर धीरे-धीरे सिनेमाघरों में यह प्रथा अपने आप बंद हो गई. सिनेमाहाल में फिल्म से पहले राष्ट्रगान बजाए जाने से कई विवाद भी हुए. कोई इसे राष्ट्रगान के अपमान की बात कहता है, कोई न बजाने से अपमान की बात कहता है, कोई कहता है कि इससे देश में राष्ट्रभक्ति की भावना बढ़ेगी. कोई कहता है कि ऐसा करने से देश का भी अपमान होता है. यही वजह है कि सिनेमाहॉल में कोई नहीं हुआ तब विवाद हो गया. कभी किसी दिव्यांग के न खड़े होने से विवाद हो गया. 2002 में महाराष्ट्र सरकार ने विधानसभा से एक आदेश पारित कर कानून बनाया और यह व्यवस्था दी कि सिनेमाघरों में फिल्म दिखाए जाने से पहले राष्ट्रगान बजाया जाएगा और मौजूद लोगों को खड़ा होना होगा. महाराष्ट्र में ऐसे आदेश के बाद तमिलनाडु में भी कुछ सिनेमाघरों ने इस प्रथा को जिंदा करने का प्रयास किया. टूट चुकी प्रथा को पुन: चालू करने में दिक्कतें भी आई. कई बार लोग खड़े नहीं हुए. इससे विवाद भी हुआ. कुछ लोग सरकार और सिनेमा मालिकों के इस रुख के खिलाफ कोर्ट की शरण में भी गए. ऐसे ही एक मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने लोगों को सिनेमाहाल में राष्ट्रगान को बंद करने का आदेश देने से इनकार कर दिया था. याचिकाकर्ता की अपील थी कि सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजने के समय अक्सर लोग खड़े नहीं होते हैं और इससे इसका अपमान होता है. कोर्ट ने अपील खारिज कर दी थी. कोर्ट ने अपने आदेश में केंद्र के उस हलफनामे का हवाला दिया था जिसमें कहा गया था कि सिनेमाहाल में दर्शकों को खड़े होने की जरूरत नहीं है जब भी राष्ट्रगान न्यूज रील या डॉक्यूमेंट्री के रूप में बजाया जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय गान, यानी ‘जन गण मन’ से जुड़े एक अहम आदेश में को कहा कि देशभर के सभी सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रीय गान ज़रूर बजेगा. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय गान बजते समय सिनेमाहॉल के पर्दे पर राष्ट्रीय ध्वज दिखाया जाना भी अनिवार्य होगा तथा सिनेमाघर में मौजूद सभी लोगों को राष्ट्रीय गान के सम्मान में खड़ा होना होगा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय गान राष्ट्रीय पहचान, राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक देशभक्ति से जुड़ा है. कोर्ट के आदेश के मुताबिक, ध्यान रखा जाए कि किसी भी व्यावसायिक हित में राष्ट्रीय गान का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. इसके अलावा किसी भी तरह की गतिविधि में ड्रामा क्रिएट करने के लिए भी राष्ट्रीय गान का इस्तेमाल नहीं होगा तथा राष्ट्रीय गान को वैरायटी सॉन्ग के तौर पर भी नहीं गाया जाएगा. दरअसल, श्याम नारायण चौकसे की याचिका में कहा गया था कि किसी भी व्यावसायिक गतिविधि के लिए राष्ट्रीय गान के चलन पर रोक लगाई जानी चाहिए और एंटरटेनमेंट शो में ड्रामा क्रिएट करने के लिए राष्ट्रीय गान को इस्तेमाल न किया जाए. याचिका में यह भी कहा गया था कि एक बार शुरू होने पर राष्ट्रीय गान को अंत तक गाया जाना चाहिए और बीच में बंद नहीं किया जाना चाहिए. याचिका में कोर्ट से यह आदेश देने का आग्रह भी किया गया था कि राष्ट्रीय गान को ऐसे लोगों के बीच न गाया जाए, जो इसे नहीं समझते. इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय गान की धुन बदलकर किसी ओर तरीके से गाने की इजाज़त नहीं मिलनी चाहिए. याचिका में कहा गया है कि इस तरह के मामलों में राष्ट्रीय गान नियमों का उल्लंघन है और यह वर्ष 1971 के कानून के खिलाफ है. इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए अक्टूबर में केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था. राष्ट्रगान के बारे में जानकारियां –  पहली बार ‘जन गण मन’ 16 दिसंबर, 1911 को कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में गाया गया था और तब तक इसे संगीतबद्ध नहीं किया गया था.  30 दिसंबर, 1911 को ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम भारत आए और कोलकाता के कुछ अख़बारों में लिखा गया कि संभवत यह गीत उनके सम्मान में लिखा गया है. लेकिन 1939 में रविंद्रनाथ टैगोर ने इसका खंडन किया.  पहली बार जन गण मन को परफॉर्म किया गया यानी इसकी संगीतबद्ध प्रस्तुति जर्मनी के हैम्बर्ग शहर में हुई.  24 जनवरी, 1950 को जन गण मन को राष्ट्रगान के तौर पर संविधान सभा ने मान्यता दी.  इसके अंग्रेजी अनुवाद को संगीतबद्ध किया मशहूर कवि जेम्स कज़िन की पत्नी मारग्रेट ने जो बेसेंट थियोसोफिकल कॉलेज की प्रधानाचार्य थीं.  नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने इसका संस्कृतनिष्ठ बांग्ला से हिंदी में अनुवाद करवाया था. कैप्टन आबिद अली अनुवाद और संगीतबद्ध कैप्टन राम सिंह ने किया था.  भारतीय राष्ट्रगान का शुरूआती दौर में नाम था ‘सुबह सुख चैन’. इस गीत के लिए आधिकारिक रूप से ज़रूरी है कि इसे 52 सेकंड में पूरा किया जाए.  राष्ट्रगान के मुद्दे पर संविधान सभा में कोई बहस नहीं हुई थी. हालांकि अनौपचारिक तौर पर मुस्लिम समुदाय को इस गीत पर कुछ आपत्ति थी. इसे राष्ट्गान बनाया गया था संविधान सभा में राष्ट्रपति के एक बयान पर.  राष्ट्रपति ने बयान जारी कर कहा था कि स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले वंदे मातरम गीत को भी बराबर का सम्मान दिया जाएगा.

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