ओपिनियन : दीनदयाल जी की “political diary” ही काफी है राजनीतिक सुधार के लिए

द्वारा : रवि रंजन,ब्लॉगर "दीनदयाल जयंती पर विशेष टिपण्णी"

0
647

दीनदयाल उपाध्याय एक भारतीय विचारक, अर्थशाष्त्री, समाजशाष्त्री, इतिहासकार और निर्भीक  पत्रकार थे. भारतीय राष्ट्रवाद के धवजवाहक के रूप में खुद को स्थापित किया.
भारतीय जनसंघ की स्थापना डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा वर्ष 1951 में किया गया एवं दीनदयाल उपाध्याय को प्रथम महासचिव नियुक्त किया गया. वे लगातार दिसंबर 1967 तक जनसंघ के महासचिव बने रहे. उनकी कार्यक्षमता, खुफिया गतिधियों और परिपूर्णता के गुणों से प्रभावित होकर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी उनके लिए गर्व से सम्मानपूर्वक कहते थे कि- ‘यदि मेरे पास दो दीनदयाल हों, तो मैं भारत का राजनीतिक चेहरा बदल सकता हूं’ परंतु अचानक वर्ष 1953 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के असमय निधन से पूरे संगठन की जिम्मेदारी दीनदयाल उपाध्याय के युवा कंधों पर आ गयी. इस प्रकार उन्होंने लगभग 15 वर्षों तक महासचिव के रूप में जनसंघ की सेवा की. भारतीय जनसंघ के 14वें वार्षिक अधिवेशन में दीनदयाल उपाध्याय को दिसंबर 1967 में कालीकट में जनसंघ का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया
दीनदयाल द्वारा स्थापित ‘एकात्म मानववाद’ की अवधारणा पर आधारित राजनितिक दर्शन भारतीय जनसंघ (वर्तमान भारतीय जनता पार्टी) की देन है. उनके अनुसार ‘एकात्म मानववाद’ प्रत्येक मनुष्य के शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का एक एकीकृत कार्यक्रम है. उन्होंने कहा कि एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में भारत पश्चिमी अवधारणाओं जैसे- व्यक्तिवाद, लोकतंत्र, समाजवाद, साम्यवाद और पूंजीवाद पर निर्भर नहीं हो सकता है. उनका विचार था कि भारतीय मेधा पश्चिमी सिद्धांतों और विचारधाराओं से घुटन महसूस कर रही है, परिणामस्वरूप मौलिक भारतीय विचारधारा का उदय हुआ ।

आज की बेअंदाज राजनीति में जब विनम्रता और शालीनता जैसे शब्द गूलर के फूल से अपरिचित हो गए हों तो बरबस ही याद आती है बीते दौर के उन नायकों की, आदर्शवाद के उन नायकों की जिन्होंने अपनी सादगी और सरलता से देश की राजनीति को लोकतांत्रिक मूल्यों के शिखर तक पहुंचाया। संविधान के गूढ़ अर्थो को आम जन तक पहुंचाने के लिए भाषणों की बजाय अपने किरदार को ही माध्यम बनाया।

जौनपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ चुके जनसंघ नेता दीनदयाल जी को ले कर पुराने जौनपुरियों के पास आज भी ढेरों संस्मरण हैं मगर उन्हें वह वाकया कभी नहीं भूलता जब चायखाने की एक बैठकी की नब्ज भांप कर दीनदयाल जी ने चुनाव से पहले ही हार मान ली और विरोधी की लोकप्रियता को सलाम कर लिया।

तब शायद उन्हें भी अंदाज़ा न रहा होगा कि उनका यह उदार किंतु ईमानदार फैसला उनके मैदान हारने के बाद भी एक अमिट संस्मरण बन जाएगा। राजनीति की रपटीली राहों में एक कभी न डिगने वाला मील का पत्थर गड़ जाएगा। बात है वर्ष 1963 के लोकसभा उप चुनाव की। जनप्रिय कांग्रेस नेता राजदेव सिंह जौनपुर संसदीय सीट से पार्टी प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहे थे।

भारतीय जनसंघ ने उनके मुकाबले अपने तपे हुए नेता पं. दीनदयाल उपाघ्याय को मैदान में उतारा था। चुनाव प्रचार चरम पर था, जनसंपर्क अभियानों की होड़ थी। उस दिन सुबह-सुबह ही दीनदयाल जी पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ लोगों से मिलने जुलने निकले थे। इत्तेफाक से वे भी ओलंदगंज स्थित पकड़ी के पेड़ के नीचे स्थित उस चाय की गुमटी तक पहुंच गए जहां बाबू साहब (राजदेव सिंह) चाय की चुस्कियों के बीच कोई चालीस-पचास नागरिकों से घिरे उनका दुख-सुख सुन रहे थे।

पंडित जी ने देखा-सुना और बइठकी का मर्म गुना। छूटते ही अपने कार्यकर्ताओें से कहा. ‘मैंने चुनाव के पहले ही हार मान ली।’ कार्यकर्ता अवाक कि यह क्या बात हुई। दीनदयाल जी ने उन्हे समझाया ‘इतनी सुबह मुंह धोये-बिना ही इतने सारे लोग जिस नेता के साथ अपना दुख-दर्द बांटने निकल पड़ते हों उसकी लोकप्रियता का अंदाज लगाया जा सकता है। ऐसे नेता से मैं चुनाव कैसे जीत सकता हूं।’ ऐसे थे दिनदयाल जी ….
आज के नेता सिर्फ़ दिनदयाल जी का “political diary” ही पढ़ ले तो और उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास करे तो राजनीतिक शुद्धीकरण अपने आप हो जाएगा ।
दीनदयाल जी की ये बातें आज भी आज भी प्रासंगिक है “हमारी राष्ट्रीयता का आधार भारत माता हैं, केवल भारत ही नहीं. माता शब्द हटा दीजिये तो भारत केवल जमीन का टुकड़ा मात्र बनकर रह जायेगा”

LEAVE A REPLY

Print This Post Print This Post